एक बार की बात है, एक जंगल में एक कछुआ रहता था वह शांत और अपने से मतलब रखने वाला जानवर था। उसी जंगल में एक खरगोश भी रहता था जो बहुत फुर्तीला और बातूनी था। वह कई बार दौड़ प्रतियोगिताएं जीत चुका था और उसे इस बात का बहुत घमंड भी था। वह दूसरे जानवरों से हमेशा अपने रेस जीतने के किस्सों के बारे में बात करता रहता था।
एक दिन जंगल के तालाब के पास कई जानवर थे, खरगोश वहां आया और हमेशा की तरह अपनी फुर्तीली चाल के बारे में बखान करने लगा। तभी उसने कछुए को देखा और उसे शैतानी सूझी। वह कछुए के पास गया और उससे कहने लगा –
खरगोश: “अरे कछुए, तुम तेज चलना क्यों नहीं सीखते? यदि तुम ऐसा करो, तो हम किसी दिन रेस लगा सकते हैं।”
कछुआ केवल उसे देखकर मुस्कुराया और आगे बढ़ गया। खरगोश कछुए को तंग करना चाहता था। अब हर दिन, वह कछुए के पास जाता और वही टिप्पणी करता। एक दिन, जब खरगोश ने उसे फिर से चुनौती दी, तो कछुए ने उत्तर दिया
कछुआ: “ठीक है, मैं चुनौती स्वीकार करता हूँ।”
उसके ऐसा कहते ही पास खड़े बाकी जानवरों को बहुत आश्चर्य हुआ लेकिन कछुए की हिम्मत देखकर वे सब ताली बजाने लगे और उसका उत्साहवर्धन करने लगे।
कुछ दिनों बाद दौड़ का दिन आया। इस बड़ी चुनौती का परिणाम देखने के लिए जंगल के सारे जानवर इकट्ठा हुए थे। जब दौड़ शुरू हुई तो कुछ ही देर में खरगोश कछुए से बहुत आगे निकल गया। कुछ दूर दौड़ने के बाद खरगोश ने जब पीछे मुड़कर देखा कि वह कछुए को इतना पीछे छोड़ आया है कि वह दिख भी नहीं रहा तो उसने दौड़ना बंद कर दिया। उसने मन में सोचा कि कछुआ अपनी धीमी चाल से जब तक उस जगह तक पहुंचेगा तब तक तो वह आराम कर सकता है। ऐसा सोचते ही खरगोश किनारे एक बड़े से बरगद के पेड़ के नीचे लेट गया। पत्तों की छाया और ठंडी हवा से उसे तुरंत नींद लग गई।
दूसरी ओर कछुआ बिना हार माने अपनी धीमी गति से लगातार चल रहा था। कुछ समय बाद वह उसी जगह पहुंच गया जहां खरगोश सो रहा था। कछुआ उसके पास से गुजरते हुए उसी तरह से चलता रहा। कुछ ही समय में लगातार चलते-चलते वह अपने लक्ष्य तक पहुंच गया और दौड़ जीत गया। सारे जानवर कछुए की जीत देखकर जोर-जोर से तालियाँ बजाने लगे। जानवरों के शोर से खरगोश हड़बड़ाकर नींद से जागा लेकिन उसे एहसास नहीं हुआ कि क्या हुआ है। उसने आँखें मलीं और मन में सोचा कि कछुआ तो अभी भी उसी गति से चल रहा होगा। खरगोश उठा और दौड़ पड़ा। लेकिन वहां पहुंचने पर कछुए को वहां पहले से खड़ा देखकर खरगोश के होश उड़ गए। कछुआ के सिर पर जीत का ताज लगा हुआ था और दूसरे जानवर उसे बधाई दे रहे थे। कछुए ने दूर से खरगोश को देखा और धीरे से मुस्कुराया। खरगोश बहुत लज्जित हुआ। उसे अपने किए पर पछतावा होने लगा क्योंकि अपने बड़बोलेपन और घमंड के कारण वह जंगल के सबसे धीरे चलने वाले जानवर से दौड़ हार गया था।
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कछुआ और खरगोश की कहानी की सीख यह है कि अति आत्मविश्वास और घमंड अच्छा नहीं होता है।